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इत-उत काहे कौं सिधारति, आंखिन आगैं ही तू आव।

इत-उत काहे कौं सिधारति, आंखिन आगैं ही तू आव।
प्रीति कौ हितु हौं तौ तेरौ जानौ, ऐसौई राखि सुभाव।
अमृत से बचन जिय की प्रकृति-सों मिलैं ऐसौई दै दाव।
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी, प्रीति को मंगल गाव॥5॥ [ राग कान्हरौ]