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रुचि के प्रकास परस्पर खेलन लागे

रुचि के प्रकास परस्पर खेलन लागे।
राग-रागिनी अलौकिक उपजत, नृत्य-संगीत अलग लाग लागे॥
राग ही में रंग रह्यौ, रंग के समुद्र में ये दोउ झागे।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी पै रंग रह्यौ, रस ही में पागे॥2॥ [राग कान्हरौ]